भारिया जनजातियों को मिलेगी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान
भारिया जनजातियों को मिलेगी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान
भारिया महोत्सव से आदिम जनजातियों की कला व संस्कृति को मिलेगी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान
सतपुड़ा की सुरम्य वादियों में स्थित पातालकोट के निवासी भारिया जनजाति तथा मैकल पर्वत श्रेणियों में निवासरत आदिम जनजाति बैगा के साथ अन्य आदिवासियों की संस्कृति व परम्परा को पुनजीर्वित तथा संरक्षण की दृष्टि से मुख्यमंत्री कमल नाथ एवं जिले के सांसद नकुल नाथ के निर्देश पर पातालकोट के ग्राम चिमटीपुर में पहली बार भारिया महोत्सव का आयोजन किया गया । इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के आदिम जनजातियों की कला व संस्कृति तथा परम्परा को संजोने के साथ ही उनकी संस्कृति व नृत्य कला को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंच प्रदान कर उनकी पहचान सुनिश्चित करना है ।
भारिया महोत्सव से आदिम जनजाति भारिया तथा बैगा में विशेष उत्साह है। महोत्सव में डिण्डोरी जिले के बैगा तथा छिन्दवाड़ा जिले के पातालकोट क्षेत्र के भारिया जनजातियों ने अपनी सुंदर कला व संस्कृति का परिचय दिया । इस दो दिवसीय भारिया महोत्सव में उनकी कला व संस्कृति का परिष्कार किया जायेगा । इसके लिये विशेष प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है । भारिया एवं बैगा के साथ क्षेत्र में गोंड जनजाति के कलाकारों ने भी अपनी विभिन्न नृत्य व संगीत शैली का प्रस्तुतिकरण दिया।
आज के वर्तमान परिदृश्य में आदिम जातियों की संस्कृति व परम्परा को लुप्त होने से बचाने के लिये जिले में सांसद श्री नकुल नाथ ने 12 एवं 13 नवंबर को चलने वाले भारिया महोत्सव का शुभारंभ कर कहा कि हरसंभव तरीके से आदिवासियों की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जायेगा । साथ ही उनके विकास के लिये क्षेत्र में कल्याणकारी कार्य किये जायेंगे । उनके स्व-रोजगार की दिशा में तथा पेयजल, सिंचाई आदि के क्षेत्र में प्रदेश सरकार कार्य करने के लिये प्रतिबध्द है।
भारिया महोत्सव से पातालकोट सहित आस-पास की आदिम जातियों में उत्साह है और वे बढ़-चढ़ कर इस महोत्सव में हिस्सा ले रहे है । जिले में इस तरह के पहली बार किये आयोजन से उनमें खुशी का माहौल है । साथ ही उनकी कला व संस्कृति को देखने दूर-दूर से पर्यटक भी आ रहे है । उनकी संस्कृति व परम्परा से परिचित होने के साथ ही क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी उनके लिये आकर्षण का केन्द्र है । पर्यटक विलेज टूरिज्म का आनंद ले रहे । इतना ही नहीं उनके रहन-सहन, वेशभूषा, संस्कृति व परम्परा से भी परिचित होकर आदिम संस्कृति को समझ रहे है।


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